भुरभुरा है दिल का गागर,
क्यूं रखेगा कोई सर पर।
हिज्र का दीया जलाऊं,
वस्ल के तूफ़ां से लड़ कर।
उनकी आंखों के दो साग़र,
ग़म बढाते हैं छलक कर।
जब से तुमको देखा हमदम,
थम गया है दिल का लश्कर।
भंवरों का घर मत उजाड़ो,
फूल, बन जायेंगे पत्थर।
झूठ का आकाश बेशक,
जल्द ढह जाता ज़मीं पर।
ग़म, किनारों का मुहाफ़िज़
सुख का सागर दिल के भीतर।
न्याय क़ातिल की गिरह में,
फ़ांसी पे मक़्तूल का सर।
आशिक़ी मांगे फ़कीरी,
दानी भी भटकेगा दर-दर।