मुझसे तन्हाई मेरी ये पूछती है,
बेवफ़ाओं से तेरी क्यूं दोस्ती है।
चल पड़ा हूं मुहब्बत के सफ़र में,
पैरों पर छाले रगों में बेख़ुदी है।
पानी के व्यापार में पैसा बहुत है,
अब तराजू की गिरह में हर नदी है।
एक तारा टूटा है आसमां पर,
शौक़ की धरती सुकूं से सो रही है।
बिल्डरों के द्वारा संवरेगा नगर अब,
सुन ये, पेड़ों के मुहल्ले में ग़मी है।
अब अंधेरों का मुसाफ़िर चांद भी है,
चांदनी के ज़ुल्फ़ों की आवारगी है।
अब खिलौनों वास्ते बच्चा न रोता,
टीवी के दम से जवानी चढ गई है।
दिल की कश्ती को किनारों ने डुबाया,
इसलिये मंझधार को से मिलने चली है।
मत लगाना हुस्न पर इल्ज़ाम दानी,
ऐसे केसों में गवाहों की कमी है।
Monday, 30 May 2011
Monday, 23 May 2011
रात तेरे वादों पर कुर्बान है।
ये रात तेरे वादों पर कुर्बान है,
अब ख़्वाबों का चौपाल भी सुनसान है।
ग़म दर्द से लबरेज़ मेरे दिल का दर,
सर पर वफ़ा का भारी सा सामान है।
पैरों पे छाले पड़ चुके हैं इश्क़ के,
पर हुस्न का दिल दर्द से अन्जान है।
दोनों मुसाफ़िर हैं सफ़र-ए-इश्क़ के,
पर मंज़िलों से उनकी ही पहचान है।
दिल का समन्दर क्यूं किनारों पर फ़िदा,
ये कश्ती-ए-मज़रूह का अपमान है।
मेरी किताबों में तेरे अल्फ़ाज़ हैं,
मेरी कलम का हौसला ज़िन्दान है ।( ज़िन्दान - क़ैद)
इस गांव के बाशिन्दे पर खाओ तरस,
तू बे-नियाज़े शह्र की सुल्तान है।
मैं क़ब्र में भी राह तेरी देखूंगा'
मरती हुई सांसों का ऐलान है।
ये इश्क़ भी दानी अंधेरों की गली,
मुश्किल निकलना,घुसना गो आसान है।
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अब ख़्वाबों का चौपाल भी सुनसान है।
ग़म दर्द से लबरेज़ मेरे दिल का दर,
सर पर वफ़ा का भारी सा सामान है।
पैरों पे छाले पड़ चुके हैं इश्क़ के,
पर हुस्न का दिल दर्द से अन्जान है।
दोनों मुसाफ़िर हैं सफ़र-ए-इश्क़ के,
पर मंज़िलों से उनकी ही पहचान है।
दिल का समन्दर क्यूं किनारों पर फ़िदा,
ये कश्ती-ए-मज़रूह का अपमान है।
मेरी किताबों में तेरे अल्फ़ाज़ हैं,
मेरी कलम का हौसला ज़िन्दान है ।( ज़िन्दान - क़ैद)
इस गांव के बाशिन्दे पर खाओ तरस,
तू बे-नियाज़े शह्र की सुल्तान है।
मैं क़ब्र में भी राह तेरी देखूंगा'
मरती हुई सांसों का ऐलान है।
ये इश्क़ भी दानी अंधेरों की गली,
मुश्किल निकलना,घुसना गो आसान है।
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Sunday, 24 April 2011
ज़िन्दगी यारो नदी है।
तुमको इज़्ज़त की पड़ी है,
मेरी दुनिया लुट रही है।
बेवफ़ाई की गली भी,
हां ख़ुदा द्वारा बनी है।
इश्क़ नेक़ी का मुसाफ़िर,
हुस्न धोखे की गली है।
हम चराग़ों के सिपाही,
आंधियों से दुश्मनी है।
चाह कर भी रुक न सकते,
ज़िन्दगी यारो नदी है।
क्यूं किनारों पर सड़ें जब,
लहरों की दीवानगी है।
तीरगी के इस सफ़र में, (तीरगी - अंधेरों)
जुगनुओं से दोस्ती है।
मेरी दरवेशी पे मत हंस,
अब यही मेरी ख़ुदी है। (ख़ुदी -स्वाभिमान)
चांद के जाते ही दानी,
चांदनी बिकने खड़ी है।
मेरी दुनिया लुट रही है।
बेवफ़ाई की गली भी,
हां ख़ुदा द्वारा बनी है।
इश्क़ नेक़ी का मुसाफ़िर,
हुस्न धोखे की गली है।
हम चराग़ों के सिपाही,
आंधियों से दुश्मनी है।
चाह कर भी रुक न सकते,
ज़िन्दगी यारो नदी है।
क्यूं किनारों पर सड़ें जब,
लहरों की दीवानगी है।
तीरगी के इस सफ़र में, (तीरगी - अंधेरों)
जुगनुओं से दोस्ती है।
मेरी दरवेशी पे मत हंस,
अब यही मेरी ख़ुदी है। (ख़ुदी -स्वाभिमान)
चांद के जाते ही दानी,
चांदनी बिकने खड़ी है।
Saturday, 16 April 2011
राम की नगरी
राम की नगरी में रावण की सभायें,
द्वारिका पर कंस की कसती भुजायें।
उस तरक्की के सफ़र में चल पड़े हम,
लक्ष्मणों का पाप ढोती उर्मिलायें।
रिश्तों की बुनियाद ढहती जा रही है,
विभिषणों की दास्तां कितनी सुनायें।
आंसुओं से भीगे रामायण के पन्ने,
तुलसी भी लिक्खे सियासत की कथायें।
आज भी मीरायें विष पी रही हैं,
आज के क्रिष्णों की ठंडी हैं शिरायें।
मस्त हैं सावित्री ओ यमराज के दिल,
सत्यवां की आंखों में उमड़ी घटायें।
गांधी के बंदर कहां अब बोलते हैं,
हर तरफ़ मनमोहनी ज़ुल्मी सदायें।
नेक़ी ईमां अब सरे बाज़ार बिकते,
पाप के असबाब से बढती वफ़ायें।
मुल्क की इज़्ज़त की किसको पड़ी है,
ग़मज़दा सारे शहीदों की चितायें।
पांडवों की हार में हंसते हैं दानी
कौरवों की जीत में ख़ुशियां मनायें।
द्वारिका पर कंस की कसती भुजायें।
उस तरक्की के सफ़र में चल पड़े हम,
लक्ष्मणों का पाप ढोती उर्मिलायें।
रिश्तों की बुनियाद ढहती जा रही है,
विभिषणों की दास्तां कितनी सुनायें।
आंसुओं से भीगे रामायण के पन्ने,
तुलसी भी लिक्खे सियासत की कथायें।
आज भी मीरायें विष पी रही हैं,
आज के क्रिष्णों की ठंडी हैं शिरायें।
मस्त हैं सावित्री ओ यमराज के दिल,
सत्यवां की आंखों में उमड़ी घटायें।
गांधी के बंदर कहां अब बोलते हैं,
हर तरफ़ मनमोहनी ज़ुल्मी सदायें।
नेक़ी ईमां अब सरे बाज़ार बिकते,
पाप के असबाब से बढती वफ़ायें।
मुल्क की इज़्ज़त की किसको पड़ी है,
ग़मज़दा सारे शहीदों की चितायें।
पांडवों की हार में हंसते हैं दानी
कौरवों की जीत में ख़ुशियां मनायें।
Sunday, 3 April 2011
ग़म के बादल
ख़ुशियों का सूर्य गायब है घर से,
छाये हैं ग़म के बादल उपर से।
आज ख़ुद रात घबराई सी है,
चांदनी भी ख़फ़ा है क़मर से।
दुनिया समझे शराबी मुझे,जब
से मिली आंख़ें तेरी नज़र से।
हार ही जीत की पहली सीढी है,
रुकते हो क्यूं पराजय के डर से।
इस महक को मैं पहचानता हूं,
बेवफ़ा गुज़री होगी इधर से।
रातें कट जाती हैं जैसे तैसे,
डरती हैं मेरी सांसें सहर से।
रोज़ वो किस गली गुल खिलाती,
कुछ पता तो करो रहगुज़र से।
दूर रख दिल पहाड़ों से,बचना
भी कठिन गर गिरोगे शिखर से।
ईद का चांद जब तक दिखे ना
मैं हटूंगा नही दानी दर से।
छाये हैं ग़म के बादल उपर से।
आज ख़ुद रात घबराई सी है,
चांदनी भी ख़फ़ा है क़मर से।
दुनिया समझे शराबी मुझे,जब
से मिली आंख़ें तेरी नज़र से।
हार ही जीत की पहली सीढी है,
रुकते हो क्यूं पराजय के डर से।
इस महक को मैं पहचानता हूं,
बेवफ़ा गुज़री होगी इधर से।
रातें कट जाती हैं जैसे तैसे,
डरती हैं मेरी सांसें सहर से।
रोज़ वो किस गली गुल खिलाती,
कुछ पता तो करो रहगुज़र से।
दूर रख दिल पहाड़ों से,बचना
भी कठिन गर गिरोगे शिखर से।
ईद का चांद जब तक दिखे ना
मैं हटूंगा नही दानी दर से।
Saturday, 19 March 2011
होली का हलवा
रोज़ पव्वा पी लिया तो पीलिया हो जायेगा,
ह्ल्दी घाटी के शहीदों का सगा हो जायेगा।
होली में भी फ़ाग गायेंगे नहीं गर चौक पर
तो गली का कुत्ता भी हमसे ख़फ़ा हो जायेगा।
भांग, शादी की मिठाई में न डालो लड़कियों,
वरना वर का बाप दुल्हा बन खड़ा हो जायेगा।
अब पतान्जलि योग शिक्षा से तनेगा हर शरीर,
पर दिमाग़ी घोड़ा रस्ते में खड़ा हो जायेगा।
घंटा बीबी का बजाते ख़ुद रहोगे दानी गर
बाइयों का लफ़ड़ा घर से कल जुदा हो जायेगा।
लड़कियों से दोस्ती करनी है तो साड़ी पहन,
तेरे पीछे लाभ अपना भी ज़रा हो जायेगा।
हुस्न खुल्लेआम गलियों में दिखाये जलवा तो,
शह्र मेरा रांची या फिर आगरा हो जायेगा।
तुम गुलाबी ,लाल सड़ी मत पहनना होली में,
सांडों का ये शह्र वरना बावरा हो जायेगा।
दिल अभी बच्चा है दानी ,पानी दोगे प्यार से,
तो मुनासिब काम खातिर ये बड़ा हो जयेगा।
ह्ल्दी घाटी के शहीदों का सगा हो जायेगा।
होली में भी फ़ाग गायेंगे नहीं गर चौक पर
तो गली का कुत्ता भी हमसे ख़फ़ा हो जायेगा।
भांग, शादी की मिठाई में न डालो लड़कियों,
वरना वर का बाप दुल्हा बन खड़ा हो जायेगा।
अब पतान्जलि योग शिक्षा से तनेगा हर शरीर,
पर दिमाग़ी घोड़ा रस्ते में खड़ा हो जायेगा।
घंटा बीबी का बजाते ख़ुद रहोगे दानी गर
बाइयों का लफ़ड़ा घर से कल जुदा हो जायेगा।
लड़कियों से दोस्ती करनी है तो साड़ी पहन,
तेरे पीछे लाभ अपना भी ज़रा हो जायेगा।
हुस्न खुल्लेआम गलियों में दिखाये जलवा तो,
शह्र मेरा रांची या फिर आगरा हो जायेगा।
तुम गुलाबी ,लाल सड़ी मत पहनना होली में,
सांडों का ये शह्र वरना बावरा हो जायेगा।
दिल अभी बच्चा है दानी ,पानी दोगे प्यार से,
तो मुनासिब काम खातिर ये बड़ा हो जयेगा।
Friday, 4 March 2011
दर्द की तहरीर
ग़म की कलम से दर्द की तहरीर लिखता हूं,
मैं जेबे-दिल में मौत की तस्वीर रखता हूं।
ख़त, जुगनुओं के रोज़ मेरे पास आते हैं,
मैं इश्क़ को अंधेरों में तन्वीर देता हूं। ( तन्वीर - रौशनी)
कासे में इस फ़क़ीर के थोड़ा ही दाना दो, ( कासा - कटोरा)
मैं भूख की फ़िज़ाओं की तकलीफ़ सहता हूं।
मक़्तूल का शिकार दरे-हुस्न में हुआ, ( मक़्तूल - जिसका क़त्ल हुआ)
अब क़ातिलों को दुआ के पीर देता हूं।
तैयार हूं मैं जलने को, महफ़िल-ए-शमअ में,
कद, पुरखों का बढाने बग़लगीर रहता हूं। (बग़लगीर- बाजू )
इस दिल के आईने को नशा तेरी ज़ुल्फ़ों का,
मैं बादलों से सब्र की जाग़ीर लेता हूं।
फुटपाथ के भरोसे मुकद्दर है चांद का,
मैं चांदनी के ज़ुल्मों की तस्दीक़ करता हूं। ( तस्दीक-पुष्टि)
गो इश्क़ की नदी में उतर तो गया हूं पर,
मंझधारे-हुस्न को कहां मैं जीत सकता हूं।
दिल का सिपाही, ज़ुल्म सियासत का क्यूं सहे,
मैं सरहदों पे दोस्ती के गीत सुनता हूं।
तुम ही मेरा जनाज़ा निकालोगी दानी जल्द,
तेरी वफ़ा से इतनी तो उम्मीद करता हूं।
मैं जेबे-दिल में मौत की तस्वीर रखता हूं।
ख़त, जुगनुओं के रोज़ मेरे पास आते हैं,
मैं इश्क़ को अंधेरों में तन्वीर देता हूं। ( तन्वीर - रौशनी)
कासे में इस फ़क़ीर के थोड़ा ही दाना दो, ( कासा - कटोरा)
मैं भूख की फ़िज़ाओं की तकलीफ़ सहता हूं।
मक़्तूल का शिकार दरे-हुस्न में हुआ, ( मक़्तूल - जिसका क़त्ल हुआ)
अब क़ातिलों को दुआ के पीर देता हूं।
तैयार हूं मैं जलने को, महफ़िल-ए-शमअ में,
कद, पुरखों का बढाने बग़लगीर रहता हूं। (बग़लगीर- बाजू )
इस दिल के आईने को नशा तेरी ज़ुल्फ़ों का,
मैं बादलों से सब्र की जाग़ीर लेता हूं।
फुटपाथ के भरोसे मुकद्दर है चांद का,
मैं चांदनी के ज़ुल्मों की तस्दीक़ करता हूं। ( तस्दीक-पुष्टि)
गो इश्क़ की नदी में उतर तो गया हूं पर,
मंझधारे-हुस्न को कहां मैं जीत सकता हूं।
दिल का सिपाही, ज़ुल्म सियासत का क्यूं सहे,
मैं सरहदों पे दोस्ती के गीत सुनता हूं।
तुम ही मेरा जनाज़ा निकालोगी दानी जल्द,
तेरी वफ़ा से इतनी तो उम्मीद करता हूं।
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